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indic_deva_eval_000200_hindi_handwritten_word_ocr | डिग्रियों | |
indic_deva_eval_000201_indic_vision_bench_deva_ocr | बारीकसारीक फेरफार करायला जावं तर सबंध इमल्यालाच तडा जायचा.
राम बाथरूममधून " छान पार्टी झाली. सगळ्यांना खूप मजा आली " असं म्हणत बाहेर आला. दर पार्टीनंतर तो जवळजवळ ह्याच शब्दात असंच म्हणायचा. तिच्या मनात आलं, हे ऐकण्याची माझी ही शेवटचीच वेळ. रामने दिलेली पार्टी अर्थात सर्व दृष्टींनी उत्तम असायची. पार्टी देण्यात त्याचा हा... | |
indic_deva_eval_000202_indic_mozhi_deva_word_ocr | चाहे | |
indic_deva_eval_000203_hindi_handwritten_word_ocr | १००वीं | |
indic_deva_eval_000204_indic_vision_bench_deva_ocr | अलीकडे मी अनेकदा विमानातून प्रवास करतो. एअर पोर्टवर 'चेक इन' झाल्यावर बोर्डिंग पास घेताना मी स्वागतिकेला आवर्जून ‘रिअर साईड विंडो'(मागील बाजूची खिडकी) या जागेचा मोठा फायदा असतो.तिथं डोक्यावरच्या शेल्फवर विमानातली सर्व वर्तमानपत्रं, मासिके ठेवलेली असतात. एअर होस्टेसला एकदा सांगून मनमुराद सारी वर्तमानपत्रं,मासिक वाचता ये... | |
indic_deva_eval_000205_hindi_handwritten_word_ocr | श्रोण | |
indic_deva_eval_000206_devanagari_page_ocr | अपदानपालि
वह
तुसिता सो चबित्वान, सुक्रमूलेन चोदितो।
गोतमस्स भगबतो, अजह्नजो सो भविस्सति॥743॥
सचे वसेय्य [सचा'वसेय्य (?)] अगारं, चक्रवत्ती भवेय्य सो।
अद्वानमेत॑ य॑ं तादी, अगारे रतिमज्ञगा॥ 744॥
निक््खमित्वा अगारम्हा, पब्बजिस्सति सुब्बतो।
राहुलो नाम नामेन, अरहा सो भविस्सति'॥745॥
“किकीब अण्डं रक्खेय्य, चामरी बिय बा... | |
indic_deva_eval_000207_hindi_handwritten_word_ocr | नामी | |
indic_deva_eval_000208_indic_mozhi_deva_word_ocr | कहा-अगर | |
indic_deva_eval_000209_hindi_handwritten_word_ocr | फ़रवरी | |
indic_deva_eval_000210_hindi_handwritten_word_ocr | यथार्थतः | |
indic_deva_eval_000211_indic_vision_bench_deva_ocr | 196 : प्रेमचंद रचनावली-6
आजकल पैसे-पैसे की तंगी है। ऊख के रुपये बाहर ही बाहर उड़ गए। अब तो मजूरी करनी पड़ती है। आज बेचारे खेत में बेहोस हो गए। रोना-पीटना मच गया। तब से पड़े हैं।'
मुंह-हाथ धोकर और खूब बाल बनाकर गोबर गांव की दिग्विजय करने निकला। दोनों चाचाओं के घर जाकर राम-राम कर आया। फिर और मित्रों से मिला। गांव में कोई... | |
indic_deva_eval_000212_indic_mozhi_deva_word_ocr | आणि | |
indic_deva_eval_000213_indic_mozhi_deva_word_ocr | हवाली | |
indic_deva_eval_000214_indic_mozhi_deva_word_ocr | घरी | |
indic_deva_eval_000215_indic_mozhi_deva_word_ocr | बोस | |
indic_deva_eval_000216_indic_vision_bench_deva_ocr | दो बहनें
पदार्थ के प्रति शर्मिला के रूद्ध स्नेह का उद्यम पिल पड़ा। सुभीता यह था कि ईंट-काठ के शरीर में धैर्य अटल बना रहता है। साजने-संवारने के महा उद्यम में दो दो नौकर हाँफ उठे। एक तो भाग ही खड़ा हुआ। कमरों की सजावट शशांक को मन में रखकर होने लगी। बैठकखाने में वह आजकल अक्सर बैठता ही नहीं, फिर भी उसीकी थकी पीठ की रीढ़ के... | |
indic_deva_eval_000217_devanagari_page_ocr | 8
अपदानपालि
“इतो तेरसकप्पम्हि, धनिद्ठो नाम खत्तियो।
सत्तरतनसम्पन्नो, चक्कवत्ती महब्बलो॥78॥
“पटिसम्भिदा चतस्सो ...पे०... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥79॥
इत्थं सुदं आयस्मा सन्धितो [सण्ठितो (सी०)] थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।
सन्धितत्थेरस्सापदानं छड़।
7. तालवण्टदायकत्थेरअपदानं
“तालवर्ण्टं मया दिन््न॑, तिस्सस्सादिच्चबन्धुनो।
ग... | |
indic_deva_eval_000218_indic_mozhi_deva_word_ocr | मानो | |
indic_deva_eval_000219_devanagari_page_ocr | धातुमाला
थव
'तत्थ आगमेतीति मुहृत्तं अधिवासेतीति अत्थो। घम्मतीति गछ्छति। आगच्छतीति आयाति।
'उग्गछ्छतीति उय्याति उद्धे गल्छति। अतिगच्छतीति अतिक्कमित्बा गच्छति। पटिगच्छतीति
पुन गच्छति। अवगच्छतीति जानाति। अधिगच्छतीति लभति जानाति वा। अनुगच्छतीति
पच्छतो गच्छति। उपगच्छतीति समीपं॑ गच्छति। अपगच्छतीति अपेति। विगच्छतीति
विगमति। ... | |
indic_deva_eval_000220_hindi_handwritten_word_ocr | जताना | |
indic_deva_eval_000221_indic_vision_bench_deva_ocr | चाऊसशेठला हे माहीत होतं. खरं तर दुष्काळाच्या वेळी नेहमीच गुरांच्या छावण्या उघडण्याचे शासनाचे आदेश असतात. कुठेतरी साखर कारखान्याच्या परिसरात दोन चार छावण्या उघडल्या जातात. पण भावे साहेबांनी यंदा कमालच केली. स्वतः प्रत्येक तालुक्यात व महसूल मंडळात जाऊन तेथे चांगलं काम करणा-या संस्थांना प्रोत्साहित करून जवळपास चाळीस गुरां... | |
indic_deva_eval_000222_indic_mozhi_deva_word_ocr | मान्य | |
indic_deva_eval_000223_indic_mozhi_deva_word_ocr | युरोपमधील | |
indic_deva_eval_000224_devanagari_page_ocr | 2. अवोपुप्फियस्थेरअपदान 288-289 8. सेनासनदायकल्थेरअपदान 343-344
3. पच्चागसनियस्थेरअपदान 290-29॥ 9. बेय्याबच्चकस्थेरअपदान 344-345
4- परप्पसादकत्थेरअपदान 29-293 0. बुद्धपड्माकस्थेरअपदान 345-346
5. भिसदायकल्थेर्अपदान 293-294 44. भिवस्वादायिवस्गो
6. सुचिस्तितत्थेरअपदान 295-296 . भिक््खदायकत्थेरअपदान 347-उ48
7. बत्थदायकल्थ... | |
indic_deva_eval_000225_indic_mozhi_deva_word_ocr | जेव्हा | |
indic_deva_eval_000226_hindi_handwritten_word_ocr | प्रदेशके | |
indic_deva_eval_000227_indic_mozhi_deva_word_ocr | कॅथलिक | |
indic_deva_eval_000228_hindi_handwritten_word_ocr | जोड़े | |
indic_deva_eval_000229_indic_mozhi_deva_word_ocr | मारता | |
indic_deva_eval_000230_hindi_handwritten_word_ocr | खरीदिए | |
indic_deva_eval_000231_hindi_handwritten_word_ocr | मुसहर। | |
indic_deva_eval_000232_indic_mozhi_deva_word_ocr | चाहे | |
indic_deva_eval_000233_devanagari_page_ocr | 24. ककुसन्धबुद्धवंसो
पालि- वेस्सभुस्स अपरेन, सम्बुद्धो द्विपदुत्तमो।
ककुसन्धो नाम नामेन, अप्पमेय्यो दुरासदो॥902॥
उम्घाटेत्वा सब्बभवं, चरियाय पारमिं गतो।
सीहोब पड्जरं भेत्वा, पत्तो सम्बोधिमुत्तमं॥903॥
धम्मचक्क पवत्तेन्ते,
चत्तारीसकोटिसहस्सानं, धम्माभिसमयों अहु॥904॥
अन्तलिक्खम्हि आकासे, यमकं कत्बा विकुब्बनं।
तिंस... | |
indic_deva_eval_000234_devanagari_page_ocr | महावंसो
किंबादी सुगतो भन््ते ॥5/2699॥
किच्छेन बासित॑ रह्/ं ॥8/20॥
कुद्धो सहाजनो रज्जो ॥6/40॥
कुन्तिपुत्ता दुबे येरा ॥8/2278
कुमारपुरिसा सब्बे ॥0/700
कुमारल्ल मनुस्खान ॥0/32॥
कुसारो तत्थ गन्त्वान ॥0/27॥
कुसारो पुच्छिछ कि भन््ते ॥5/427॥
कुसारो रस्मिसादाय ॥0/55॥
कुलेहि सो सोव्ठसह्ि ॥9/430
कुबण्णाया'ति सुल्वाह ॥7/66॥
कु... | |
indic_deva_eval_000235_indic_mozhi_deva_word_ocr | मामांनी | |
indic_deva_eval_000236_hindi_handwritten_word_ocr | माध्यम | |
indic_deva_eval_000237_devanagari_page_ocr | सहावंसो
263
नगरस्से'कदेसम्हि, रम्मे भिक्खुनुपस्सये।
कारापिते नरिन््देन, वासं कप्पेसि सुब्बता॥44॥
उपासिकाहि ताहे'स, बुत्थो भिक््खुनुपस्सयो।
उपासिकाविहारो ति, तेन लंकाय विस्सुतो॥42॥
आगिनेय्यो महा'रिट्लो, धम्मासोकस्स राजिनो।
अप्पेत्वा राजसन्देसं, थेरसन्देस'मत्रवि॥3॥
भातुजाया सहायस्स, रज्ञो ते राजकुझ्जरा।
आकहक्चष... | |
indic_deva_eval_000238_devanagari_page_ocr | अपदानपालि
'पदुसुत्तरो लोकविदू, आहतीनं पटिग्गहो।
सड्कप्पसज्ञाय, आगच्छि मम सन्तिकं॥658॥
&
मम सड्ल्
“उपागतं महानागं, देवदेव॑ नरासभं।
बिव्ठालिं पर्गहेत्वान, पत्तम्हि ओकिरिं अहं॥659॥
“परिभुडिज महावीरो, तोसयन््तो मम तदा।
'परिभुञजित्वान सब्बज्झू, इमं गा अभासथ॥660॥
““सक॑ चित्त पसादेत्वा, बिव्ठालिं मे अदा तुवं।
कप्पानं सत... | |
indic_deva_eval_000239_hindi_handwritten_word_ocr | तौर-तरीका | |
indic_deva_eval_000240_hindi_handwritten_word_ocr | निडाना | |
indic_deva_eval_000241_indic_mozhi_deva_word_ocr | टाळतात. | |
indic_deva_eval_000242_devanagari_page_ocr | 66 धम्मसज्भणि
«५. कतमानि तस्मिं समये सत्त बलानि होन्ति? सद्धाबलं, वीरियबलं, सतिबलं, समाथिबलं,
'पड्ञाबलं, हिरिबलं, ओत्तप्पबलं।
«९६. कतमं तस्मि समये सद्धावलं होति? या तस्मि समये सद्धा सद्हना ओकप्पना अभिष्पसादो
सद्धा सद्धिन्द्रियं सद्धावलं - इदं तस्मिंसमये सद्धाबलं होति।
९७. कतमं तस्मिं समये वीरियबलं होति? यो तस्मिं सम... | |
indic_deva_eval_000243_indic_mozhi_deva_word_ocr | उसके | |
indic_deva_eval_000244_indic_mozhi_deva_word_ocr | परिस्थिती | |
indic_deva_eval_000245_indic_vision_bench_deva_ocr | 224 : प्रेमचंद रचनावली-6
अब तो तुम कभी ऐसी शरारत न करोगे?
'कभी नहीं, जीते जी कभी नहीं।'
'कान पकड़ो।'
'कान पकड़ता हूं, मगर अब तुम दया करके जाओ और मुझे एकांत में बैठकर सोचने और रोने दो। तुमने आज मेरे जीवन का सारा आनंद...।'
मालती और जोर से हंसी-देखो, तुम मेरा बहुत अपमान कर रहे हो और तुम जानते हो,
रूप अपमान नहीं सह सकता। म... | |
indic_deva_eval_000246_hindi_handwritten_word_ocr | जंग | |
indic_deva_eval_000247_hindi_handwritten_word_ocr | खाधान्न | |
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indic_deva_eval_000251_indic_mozhi_deva_word_ocr | सम्पूर्ण | |
indic_deva_eval_000252_indic_vision_bench_deva_ocr | ८१
छुटकारा
ऐसा कहना ठीक नहीं है। और साधारण विचार करनेसे भी हमें लगेगा कि 'अंग्रेजोंके बिना आज तो हमारा काम चलेगा ही नही.' ऐसा कहना अंग्रेजोंको अभिमानी बनाने जैसा होगा।
अंग्रेज बोरिया-बिस्तर बांधकर अगर चले जायेंगे, तो हिन्दुस्तान अनाथ हो जायगा ऐसा नही मानना चाहिये। अगर वे गये तो संभव है कि जो लोग उनके दबावसे चूप रहे हों... | |
indic_deva_eval_000253_hindi_handwritten_word_ocr | बंधे | |
indic_deva_eval_000254_indic_mozhi_deva_word_ocr | क्या-क्या | |
indic_deva_eval_000255_hindi_handwritten_word_ocr | अपनो | |
indic_deva_eval_000256_indic_mozhi_deva_word_ocr | में | |
indic_deva_eval_000257_indic_mozhi_deva_word_ocr | अलवर | |
indic_deva_eval_000258_indic_mozhi_deva_word_ocr | लेकिन | |
indic_deva_eval_000259_indic_mozhi_deva_word_ocr | आणि | |
indic_deva_eval_000260_indic_mozhi_deva_word_ocr | हुए | |
indic_deva_eval_000261_indic_mozhi_deva_word_ocr | झालेल्या | |
indic_deva_eval_000262_devanagari_digits_mixed | 3७२८5६4४६१ | |
indic_deva_eval_000263_devanagari_digits_mixed | ७1७९35४2 | |
indic_deva_eval_000264_indic_mozhi_deva_word_ocr | कठोर-से-कठोर | |
indic_deva_eval_000265_indic_vision_bench_deva_ocr | प्रास्ताविक
गेली दहा-बारा वर्षे ग्रामीण भागात मी खूप हिंडलोफिरलो.
विशेषतः जेथे नवनिर्माणाचे काही काम घडले, चळवळी झाल्या ते
भाग, तेथील बदल मी जवळून पाहिले. काही ठिकाणी थोडेफार
प्रत्यक्ष कामही केले. त्या त्या वेळी जसजशी मनःस्थिती होती
तसतसे काही लिखाणही केले. कधी अंतर्मुख होऊन. कधी बहिर्मुख
वृत्तीने. त्यामुळे काही लिखाण ... | |
indic_deva_eval_000266_indic_mozhi_deva_word_ocr | नाही, | |
indic_deva_eval_000267_devanagari_digits_mixed | ८0281२९७5 | |
indic_deva_eval_000268_indic_vision_bench_deva_ocr | त्यात पुन्हा पाण्याचा सुरू झालेला त्रास, बौद्धवाड्यातला हापसा आटलेला गावात एक सामुदायिक विहीर होती. तिथं रोज या उन्हाळ्यात टँकरनं चार-पाच खेपा करून पाणी टाकलं जायचं.
मघाशीच टँकर येऊन पाणी ओतून गेल्याची खबर मिळताच सारेजण घागरी - बादल्या घेऊन पळत सुटले. बुद्धवाड्यात बांधलेल्या समाजमंदिरात रखमा-भीमी निवांतपणे सुखदुःखाच्या... | |
indic_deva_eval_000269_devanagari_page_ocr | सच्दनीतिप्पकरणं
26: न्
दुक्खं, त॑ नत्थि एत्थाति नाकोति अत्थों गहेतब्बो। यथेत्थ इत्थीसद्धादीन॑ नामिकपदमाला
योजिता, एबं “बितक्को बिचारो आभा पदीपो”तिआदीनम्पि योजेतब्बा।
भू, भू, भुयो। भुं, भू, भुयो। भुया, भूहि, भूभि। भुया, भूनं। भुया, भूहि, भूभि। भुया, भूनं।
भुया, भुयं, भूस। भोति भु, भोतियो भू, भोतियो भुयो। एत्थ च “भूरु... | |
indic_deva_eval_000270_indic_mozhi_deva_word_ocr | जोरजोरात | |
indic_deva_eval_000271_indic_mozhi_deva_word_ocr | एकदा | |
indic_deva_eval_000272_devanagari_page_ocr | 'पदमाला
343
मज्ज संसुद्धियं। मज्जति। बाहिरं परिमज्जति। भूमिं सम्मज्जति। मज्जनं। सम्मज्जनी।
निडिजि सुद्धियं। निउजति। पनिड्जति। निडिजितुं। पनिडिजितुं। निडिजित्वा। पनिडिजित्बा।
अय॑ पन पाछ्ठति “ततो त्व॑ं मोग्गललान उद्लायासना उदकेन अक्खीनि पनिडिजत्वा दिसा
अनुलोकेय्यासी”ति।
निजि अब्यत्तसद्दे। निउजति।
भज पाके। तिलानि भज्... | |
indic_deva_eval_000273_indic_vision_bench_deva_ocr | देवलांची शारदा
गोविंद बल्लाळ देवल यांचा जन्म इ. स. १८५५ साली झाला. त्यानुसार त्यांची जन्मशताब्दी इ. स. १९५५ ला मोठ्या प्रमाणावर साजरी व्हायला हवी होती, पण ती झाली नाही. देवल १९१६ ला वारले. यानुसार त्यांची पन्नासावी पुण्यतिथी पुढच्या वर्षी येते. कृतज्ञता म्हणून ही पुण्यतिथी आपण कै. देवलांच्या नाट्यसेवेच्या फेर मूल्यमापन... | |
indic_deva_eval_000274_devanagari_page_ocr | सुवण्णबिब्बोहनवग्गो 79
“सत्तसद्ठिम्हितो कप्पे, पटिजग्गसनामका।
सत्तरतनसम्पन्ना, सत्तासूं चकक््कवत्तिनों [पटिजग्गसनासकों। सत्तरतनसम्पन्नो,
चक्कवत्ती महब्बलो (स्या०)]॥340॥
“पटिसस्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासन”॥344॥
इत्थं सुदं आयस्मा चितकपूजको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।
चितकपूजकत्थेरस्सापदानं सत्तमं।
8. आल... | |
indic_deva_eval_000275_indic_mozhi_deva_word_ocr | दस-पाँच | |
indic_deva_eval_000276_devanagari_digits_mixed | ८२५ | |
indic_deva_eval_000277_indic_mozhi_deva_word_ocr | रामेशम | |
indic_deva_eval_000278_hindi_handwritten_word_ocr | थू। | |
indic_deva_eval_000279_hindi_handwritten_word_ocr | बंदे | |
indic_deva_eval_000280_devanagari_page_ocr | 358
मेत्तेयवग्गो
““सतसहस्सस्स वयं [वर्य सतसहस्संव (क०)], दत्वा [कत्वा (सी" पी०)] कारापितो मया।
तबत्थाय महासेतु, पटिग्गण्ह महामुने॥4703॥
““पदुसुत्तरो लोकबिदू, आहतीन पटिग्गहो।
भिक्खुसडूघे निसीदित्वा, इमा गाथा अभासथ॥4704॥
““यो मे सेतुं अकारेसि, पसन्नो सेहि पाणिशि।
तमहं कित्तयिस्सामि, सुणाथ मम भासतो॥4705॥
““दरितो पब्बतत... | |
indic_deva_eval_000281_indic_mozhi_deva_word_ocr | कमला | |
indic_deva_eval_000282_devanagari_page_ocr | 'पदमाला
95
एकबचनप्पयोगा पन अप्पा। सेय्यथिदं? “गरूनं दारे, धम्म॑ चरे योपि समुड्जकं चरे,
दारड्ल्व पोसं ददमप्पकस्मि”न्ति च,
“ये गहद्ला पु्जकरा, सीलवन्तों उपासका।
धम्मेन दारं पोसेन्ति, ते नमस्सामि मातली”ति च,
“परदारं न गच्छेय्यं, सदारपसुतो सिय”'
“यो इच्छे पुरिसो होतुं, जातिं जातिं पुनप्पुनं।
परदारं विवज्जेय्य, धोतपादोब क... | |
indic_deva_eval_000283_devanagari_page_ocr | 98 अनुपिटके
“यो खो, भन््ते, अजानन्तो गण्हेय्य, सो बलवतरं डस्हेय्या”"ति। “एवमेव खो, महाराज,
यो अजानन््तो पापकम्मं करोति, तस्स बहुतरं अपुष्ञं"ति।
“कल्लोसि, भन््ते नागसेना”ति।
38. इमिना सरीरेन देवलोकगमन!
राजा आह- “भन्ते नागसेन, अत्थि कोचि, यो इमिना सरीरेन उत्तरकुरुं वा गच्छेय्य,
ब्रह्मलोक॑ वा, अच्ज॑ वा पन दीप॑"ति?
... | |
indic_deva_eval_000284_indic_mozhi_deva_word_ocr | मक्ता | |
indic_deva_eval_000285_indic_vision_bench_deva_ocr | खरेदी हा अन्याय आहे. एकाधिकारात फायदा कुणाचा झाला? कापूस खरेदीसाठी सहा महिन्याचा नोकरवर्ग आवश्यक तिथे १२ महिन्याचा नोकरवर्ग भरती केला. प्रशासकीय खर्च प्रचंड, कापसाची रुई करायचा खर्च जास्त, हा कापूस विकताना व्यापारी जेवढा भाव देतो तेवढा भावही एकाधिकारात मिळत नाही. हे सर्व मुंबईतल्या गिरणी मालकाच्या फायद्यासाठी चाललंय. ए... | |
indic_deva_eval_000286_indic_mozhi_deva_word_ocr | अधिक | |
indic_deva_eval_000287_hindi_handwritten_word_ocr | फीचर | |
indic_deva_eval_000288_hindi_handwritten_word_ocr | क़ासिम | |
indic_deva_eval_000289_indic_mozhi_deva_word_ocr | पूरे | |
indic_deva_eval_000290_hindi_handwritten_word_ocr | विडंबना | |
indic_deva_eval_000291_devanagari_page_ocr | सुशूतिव्गो 2०३
इत्थ॑ सुदं आयस्मा पड्चसीलसमादानियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।
'पड्चसीलसमादानियत्थेरस्सापदानं चतुत्थं।
5. अन्नसंसावकत्थेरअपदानं
“सुवण्णवण्णं सम्बुद्धं, गछ्छन्तं अन्तरापणे।
कड्चनग्धियसंकासं, बात्तिसवरलक्खणं॥958॥
“सिद्धत्थं लोकपज्जोतं, अप्पमेय्यं अनोपमं।
अलत्थ॑ परम पीतिं, दिस्वा दन्तं जुतिन्धरं॥959॥
“सम... | |
indic_deva_eval_000292_indic_mozhi_deva_word_ocr | उसे | |
indic_deva_eval_000293_indic_mozhi_deva_word_ocr | विशेष | |
indic_deva_eval_000294_hindi_handwritten_word_ocr | स्वच्छंद | |
indic_deva_eval_000295_hindi_handwritten_word_ocr | करने | |
indic_deva_eval_000296_devanagari_page_ocr | संयुत्तनिकायपालि
**तम्घ तुम्हे, भिक्खवे, एवं पुद्ठा एवं ब्याकरमाना वुत्तवादिनो चेव मे होथ, न च म॑
अभूतेन अब्भाचिक्खथ, धम्मस्स चानुधम्मं ब्याकरोथ, न चर कोचि सहधम्मिको दानुवादो
गारय्ह॑ ठान॑ं आगच्छति। दुक्खस्स हि परिज्ञत्थं मयि ब्रह्मचरियं वुस्सति। सचे वो, भिक्खवे,
अज्जतित्थिया परिब्बाजका एवं पुच्छेय्युं--
“अत्थि पनावु... | |
indic_deva_eval_000297_indic_vision_bench_deva_ocr | गोदान:149
का अंग नहीं है। मालती ने तो आज के लिए नए फैशन की साड़ी निकाली थी, नए काट के
जंपर बनवाए थे। और रंग-रोगन और फूलों से खूब सजी हुई थी, मानो उसका विवाह हो रहा हो। वीमेंस लीग में इतना समारोह और कभी न हुआ था। डाक्टर मेहता अकेले थे, फिर भी देवियों के दिल कांप रहे थे। सत्य की एक चिंगारी असत्य के एक पहाड़ को भस्म कर सक... | |
indic_deva_eval_000298_hindi_handwritten_word_ocr | गुरुर्ब्रह्मा | |
indic_deva_eval_000299_devanagari_page_ocr | आलम्बणदायकवरग्गो
आलम्बणदायकबग्गो कह
“एकत्तिंसे इतो कप्पे, यं कम्ममकरिं तदा।
दुग्गतिं नाभिजानामि, वन््दनाय इदं फलं॥452॥
“चलुवीसतिकप्पम्हि, विकतानन्दनामको।
सत्तरतनसम्पन्नो, चक्कबत्ती महब्बलो॥453॥
“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥454॥
इत्थं सुदं आयस्मा एकवन्दनियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।
एकबन्द... |
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